Hi beautiful and Peaceful Souls,
सब बुरे कर्म (https://satvagunavidhushi.blogspot.com/2020/10/blog-post.html) रजोगुण और तमोगुण की अधिकता के कारण होते है इसलिए हमे हमेशा अच्छे कर्म करने चाहिए और सत्वगुण एकत्रित करना चाहिए जिससे हम सत्वगुणी बन सके|
सत्वं ज्ञानं तमोSज्ञानं रागद्वेषो रजः स्मृतम |
एतद् व्याप्तिमदेतेषां सर्वभूताश्रितं वपुः ||
जब यथार्थ ज्ञान हो तब सत्व गुण, जब अज्ञान हो तम, और जब राग-द्वेष आत्मा में अधिक हो तब रजोगुण होता है| सभी प्राणियों में ये तीन गुण व्याप्त रहते है|
तमसो लक्षणं कामो रजसस्त्वर्थ उच्यते |
सत्वस्य लक्षणं धर्मः श्रेष्ठयमेषां यथोतरम् ||
कामभावना की प्रधानता तमोगुण का मुख्य लक्षण है| धन संग्रह की इच्छा रजोगुण का मुख्य लक्षण है| और सत्वगुण का मुख्य लक्षण धर्म आचरण करना है|
सत्व, रज और तमस प्रकृति के तीन गुण है जो आत्मा को प्रभावित करते है| जिस प्राणी के शरीर में जिस गुण की अधिकता होती है वह प्राणी उस गुण विशेष के लक्षणों से सम्पन हो जाता है और वह अपने मन वचन और शरीर से वैसे ही कर्म करता है| और उन्ही कर्मो के अनुसार मनुष्यो की उत्तम, अधम, और मध्यम तीन गतियाँ और उसी के अनुसार प्राणी का परजन्म निर्धारित होता है|
तत्र यत्प्रीतिसंयुक्तं किंचिदात्मनि लक्षयेत् |
प्रशान्तमिव शुद्धाभं सत्वं तदुपधारयेत ||
वेदाभ्यासस्तपो ज्ञानं शौचमिन्द्रियनिग्रहः |
धर्मक्रियात्मचिन्ता च सात्विकं गुणलक्षणम् ||
यत्सर्वेणेच्छति ज्ञातुं यनन् लज्जति चाचरन् |
येन तुष्यति चात्माSस्य तत्सत्वगुणलक्षणम् ||
१. सत्वगुण प्रधानता की पहचान- जो प्रसन्न, सुखयुक्त, शान्तियुक्त और निर्मलतायुक्त हो जो वेदो के अभ्यास, धर्मानुष्ठान, इन्द्रियों पर रोक और आत्मा चिंतन की इच्छा रखता और व्यवहार भी करता हो| जो मनुष्य धर्माचरण और अच्छे कर्म करने मे लज्जा ना करता हो वह सत्वगुण प्रधान मनुष्य है | अब प्रश्न ये उठता है की मनुष्य में सत्वगुण की प्रधानता कितनी है उसके अनुसार उसके लक्षण और कर्म होते है और परजन्म भी होता है| जिसे गौण गतिया कहा जाता है | जो इस प्रकार है|
ब्रह्मा विश्वस्रजो धर्मो महानव्यक्तमेव च |
उत्तमां सत्विकिमेनां गतिमाहुर्मनीषिणः ||
अ. उत्तम सत्वगुणी- जो उत्तम सत्वगुणयुक्त होकर उत्तम कर्म करते है वह सब वेदो के ज्ञाता, सर्वोत्तम बुद्धियुक्त, प्रकृति के रहस्य को जानकर सूक्ष्म और दूरस्थ विषयो के ज्ञान की प्राप्ति करते है | इन्द्रियों पर विजय पा यह मोक्ष को प्राप्त करते है|
यज्वान ऋषयो देवा वेदा ज्योतिषि वत्सराः |
पितरश्चैव साध्याश्चैव द्वितीया सात्विकी गतिः ||
आ. मध्यम सत्वगुणी- जो मध्यम सत्वगुणयुक्त होकर कर्म करते है वे जीव यज्ञकर्ता, वेद विद्वान, रक्षक, साध्य का जन्म पाते है|
तापसा यतयो विप्रा ये च वैमानिका गणाः |
नक्षत्राणि च दैत्याश्च प्रथमा सात्विकी गतिः ||
इ. अधम सत्वगुणी- तपस्वी, सन्यासी, वेदपाठी, ज्योतिषी और देह पोषक मनुष्य (charmer) का जन्म पाते है|
विशुद्ध मनुस्मृति के इस ज्ञान से हम जान सकते है कि हमारे अंदर कितना सत्व गुण है| और इस ज्ञान से यह भी पता लगा सकते है की हम अपने जीवन को किस ओर ले जा रहे है और उसके क्या परिणाम होंगे|
Your's Sincerely
Purnima Ghai
References:
Book: Vishudh Manusmriti
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